Follow Us:

हिमाचल विधानसभा के बाहर आउटसोर्स कर्मचारियों का शक्ति प्रदर्शन, पॉलिसी और नौकरी की मांग पर सरकार को दो महीने का अल्टीमेटम

25 हजार आउटसोर्स कर्मचारियों ने विधानसभा के बाहर किया प्रदर्शन, पॉलिसी बनाने की मांग
15 से 20 साल से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों ने मृतकों के आश्रितों को नौकरी देने की मांग उठाई
सरकार को दो महीने का अल्टीमेटम, मांगें पूरी न होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी


शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के बीच मंगलवार को शिमला का चौड़ा मैदान आउटसोर्स कर्मचारियों की आवाज से गूंज उठा। प्रदेश के अलग-अलग सरकारी विभागों में लंबे समय से सेवाएं दे रहे सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों ने विधानसभा के बाहर प्रदर्शन कर सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं। कर्मचारियों का कहना है कि वे वर्षों से सरकारी विभागों का काम संभाल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके भविष्य की कोई स्थायी सुरक्षा नहीं है।

प्रदर्शनकारियों ने सरकार से आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए पॉलिसी बनाने, सेवा के दौरान मृत कर्मचारियों के आश्रितों को नौकरी देने और लंबे समय से चले आ रहे शोषण को खत्म करने की मांग उठाई। कर्मचारियों ने साफ किया कि अब वे केवल आश्वासन के भरोसे पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने सरकार को मांगों पर कार्रवाई के लिए दो महीने का अल्टीमेटम दिया है। तय समय में समाधान नहीं होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी गई है।

15 से 20 साल की सेवा के बाद भी भविष्य अनिश्चित

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में बड़ी संख्या में आउटसोर्स कर्मचारी 15 से 20 साल तक सेवाएं दे चुके हैं। इतने लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बने रहने के बावजूद उनकी नौकरी की कोई पक्की गारंटी नहीं है।

कर्मचारियों के मुताबिक उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि वर्षों तक काम करने के बाद भी उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि अगले महीने उनकी नौकरी रहेगी या नहीं। किसी विभाग में व्यवस्था बदलने, ठेका बदलने या अन्य कारणों से उनकी सेवाएं समाप्त होने का खतरा बना रहता है।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के लिए सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे उनके रोजगार और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। उनका तर्क है कि यदि किसी कर्मचारी ने वर्षों तक सरकारी विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं तो उसके भविष्य को केवल आउटसोर्स व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

प्रदेश में करीब 25 हजार आउटसोर्स कर्मचारी

आउटसोर्स कर्मचारी संघ के अनुसार प्रदेश में विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 25 हजार आउटसोर्स कर्मचारी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें अलग-अलग विभागों और संस्थानों में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालने वाले कर्मचारी शामिल हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग वर्षों से सरकारी कामकाज में योगदान दे रहे हैं, लेकिन उनके लिए अब तक ऐसी ठोस नीति नहीं बन पाई है, जो उनके रोजगार को सुरक्षा दे सके। उनका दावा है कि वे करीब एक दशक से आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए पॉलिसी बनाने की मांग उठा रहे हैं।

पूर्व सरकार के कार्यकाल में भी कर्मचारियों ने इस मांग को लेकर आंदोलन किए थे। लंबे समय तक आवाज उठाने के बावजूद कोई स्थायी नीति नहीं बन सकी। अब मौजूदा सरकार के सामने भी कर्मचारियों ने यही मांग दोहराई है और स्पष्ट किया है कि इस बार वे अपनी मांगों के समाधान तक संघर्ष जारी रखने के लिए तैयार हैं।

करीब 12 हजार रुपये मानदेय मिलने का दावा

आउटसोर्स कर्मचारियों ने कम मानदेय को लेकर भी सरकार के सामने नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि मौजूदा महंगाई के दौर में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को करीब 12 हजार रुपये मासिक मानदेय में काम करना पड़ रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि इतने कम मानदेय में परिवार का खर्च चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई बढ़ने के साथ बच्चों की शिक्षा, घर का खर्च और अन्य जरूरी जरूरतें पूरी करना चुनौती बन गया है।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि एक तरफ उनसे नियमित कर्मचारियों की तरह लंबे समय तक काम लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ वेतन और नौकरी की सुरक्षा के मामले में उन्हें अस्थिर व्यवस्था में रखा जाता है। इसी वजह से कर्मचारियों में लंबे समय से असंतोष बना हुआ है।

मृत कर्मचारियों के आश्रितों को नौकरी देने की मांग

प्रदर्शन के दौरान सेवा के दौरान जान गंवाने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के आश्रितों को नौकरी देने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। कर्मचारियों का कहना है कि यदि किसी आउटसोर्स कर्मचारी ने सरकारी विभाग में वर्षों तक सेवा दी और इसी दौरान उसकी मृत्यु हो गई, तो उसके परिवार को अचानक आर्थिक संकट में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

आश्रितों के लिए रोजगार की व्यवस्था की मांग को कर्मचारियों ने मानवीय और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया। उनका कहना है कि कर्मचारी के निधन के बाद परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे परिवारों के लिए सरकार को संवेदनशीलता के साथ नीति बनानी चाहिए।

सरकार को दो महीने का अल्टीमेटम, आंदोलन की चेतावनी

चौड़ा मैदान में प्रदर्शन के दौरान आउटसोर्स कर्मचारियों ने सरकार को दो महीने का समय दिया। कर्मचारियों ने कहा कि इस अवधि में यदि उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस पहल नहीं हुई तो वे आंदोलन को और व्यापक करेंगे।

आउटसोर्स कर्मचारी संघ का कहना है कि कर्मचारी लंबे समय से अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से सरकार के सामने रखते आए हैं। अब वे चाहते हैं कि सरकार केवल आश्वासन देने के बजाय उनकी समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाए।

कर्मचारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉलिसी बनाने की मांग कोई नई मांग नहीं है। यह मुद्दा पिछले कई वर्षों से सरकारों के सामने उठता रहा है। इसलिए अब इस पर स्पष्ट निर्णय लिया जाना चाहिए।

‘अब कर्मचारी पीछे हटने को तैयार नहीं’

आउटसोर्स कर्मचारी संघ के कन्वीनर अश्वनी शर्मा ने कहा कि कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने सरकार से जल्द समाधान की उम्मीद जताई।

अश्वनी शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू शोषित वर्गों के लिए फैसले लेने की दिशा में काम कर रहे हैं और इसी कारण आउटसोर्स कर्मचारियों को भी सरकार से काफी उम्मीदें हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि मुख्यमंत्री कर्मचारियों की लंबे समय से चली आ रही समस्या को समझेंगे और उनके हित में निर्णय लेंगे।

हालांकि, संगठन ने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उम्मीद के साथ-साथ अब कर्मचारियों ने अपनी अगली रणनीति भी तय कर ली है। दो महीने के अल्टीमेटम के बाद यदि मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को तेज किया जाएगा।

विधानसभा के अंदर भी उठा आउटसोर्स भर्ती का मुद्दा

आउटसोर्स कर्मचारियों का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ, जब विधानसभा के भीतर भी आउटसोर्स भर्ती को लेकर राजनीतिक बहस और हंगामा देखने को मिला। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और सदन की कार्यवाही के दौरान वॉकआउट भी किया।

इस तरह मंगलवार को आउटसोर्स कर्मचारियों का मुद्दा विधानसभा के बाहर प्रदर्शन से लेकर सदन के भीतर राजनीतिक बहस तक चर्चा में रहा। एक ओर कर्मचारी अपने रोजगार और भविष्य की सुरक्षा के लिए सरकार से नीति की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने भी इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ उठाया।

अब कर्मचारियों की नजर सरकार की अगली कार्रवाई पर है। दो महीने की समयसीमा ने सरकार के सामने इस मुद्दे को लेकर स्पष्ट निर्णय लेने का दबाव बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों की मांगों पर क्या कदम उठाती है और वर्षों से लंबित आउटसोर्स नीति को लेकर कोई ठोस रास्ता निकलता है या नहीं।